• 07 Oct, 2026

Article - Open Eye News

क्यों डूबी द्वारिका नगरी..??

क्यों डूबी द्वारिका नगरी..??

श्री कृष्ण की नगरी द्वारिका महाभारत युद्ध के 36 वर्ष पश्चात समुद्र में डूब जाती है। द्वारिका के समुद्र में डूबने से पूर्व श्री कृष्ण सहित सारे यदुवंशी भी मारे जाते है। समस्त यदुवंशियों के मारे जाने और द्वारिका के समुद्र में विलीन होने के पीछे मुख्य रूप से दो घटनाएं जिम्मेदार है।

महाबली हनुमान जी के सामने जब रावण की हुई बोलती बंद

आज मंगलवार के दिन वीर बजरंगबली की वंदना उनके भक्त करते हैं। जो लोग परेशान होते हैं वह सीधे हनुमान जी की शरड़ में आने मात्र से सभी कष्टों से मुक्त हो जाते हैं। हनुमान जी जैसा पराक्रम भला है किसी में। यहां तक कि उन्होंने रावण की बोलती भी बंद कर दी थी।

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गोत्र क्या है? तथा भारतीय सनातन आर्य परम्परा में इसका क्या सम्बंध है..??

भारतीय परम्परा के अनुसार विश्वामित्र, जमदग्रि, वसिष्ठ और कश्यप की सन्तान गोत्र कही गई है-"गौतम, भरद्वाज, अत्रि,विश्वामित्रो जमदग्निर्भरद्वाजोऽथ गोतमः । अत्रिर्वसिष्ठः कश्यप इत्येते गोत्रकारकाः"

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घर में कुबेर भगवान का यंत्र रखते समय इन बातों का रखें खास ध्यान, मिलेगा लाभ

अगर आप जीवन में आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं तो आप अपने घर में कुबेर भगवान का यंत्र लगा सकते हैं, लेकिन कुबेर यंत्र लगाने से पहले आपको जरूरी बातों का ध्यान रखना होगा. वरना आपको कुबेर यंत्र का कोई लाभ नहीं मिलेगा और परेशानियां और बढ़ने लगेंगी.

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Lucky Number in 2024-कौन सा अंक लकी होगा

: हर वर्ष आपके लिए भाग्य में बदलाव लाता है। अगर ज्योतिष में यकीन है तो फिर आपको जानना चाहिए कि हर राशि के लिए कुछ अंक होते हैं जो बहुत भाग्यशाली साबित होते हैं। लेकिन अगर जानकारी नहीं हो तो फिर इन अंकों का इस्तेमाल हम नहीं कर पाते।इन अंकों में किस्मत छुपी होती है और इसलिए ये जानना जरुरी है कि आपकी राशि के हिसाब से आपके लिए कौन सा अंक लकी होगा। राशि के अनुसार यहां हम बता रहे हैं

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हम भारत के लोग....

हम भारत के लोग… वाकई दुनिया से अलग हैं और शायद इसी वजह से पूरी दुनिया में कभी भी-कहीं भी घुल मिल जाते हैं और मौका मिलते ही उस देश के रंग में पूरी तरह मिलकर वहीं बस तक जाते हैं लेकिन फिर भी अपनी पहचान का सबसे गाढ़ा रंग सहेजकर रखते हैं यह रंग है भारतीयता का और उदघोष है हम भारत के लोग का।

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सुनो वोटर…कि अब गए दिन चुनाव (बहार) के..!!

चुनावी खर्च की सीमा और चुनाव आयोग की सख़्त निगरानी ने सभी उम्मीदवारों को 'लेबल प्लेइंग फील्ड' दे दी है। भोंपूओ का कर्कस शोर नहीं है और न दिन रात की चिल्लपों…अब चुनाव होते नहीं, लड़े जाते हैं और चुनाव की 'तैयारियां' नहीं 'प्रबंधन' होता है। पोस्टर,बैनर और झंडों का स्थान सोशल मीडिया ने लिया है

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